Tuesday, April 24, 2007

वर्जीनिया टेक की घटना और मेरे अनुभव-1

अभी हाल में वर्जीनिया टेक में हुए नरसंहार ने हम लोग को ऊपर से नीचे तक हिला दिया। इस घटना ने बहुत सारे अनुभव भी दिए। इस घटना ने जो सिखाया उसे शायद सीखने में इन्सान कि उम्र निकल जाये, और ये ज़रूरी है कि उसकी उचित मीमांसा भी कि जाये। पहले दो दिन तक दिमाग झटके में ही रहा और कुछ महसूस नहीं हुआ। फिर धीरे धीरे जैसे मृत लोगों के बारे में खबरें आने लगीं, दिल में बेबसी, दुःख, ग़ुस्सा, अपराधबोध और ना जाने क्या क्या भावनाएं आयीं। घटना के अलावा कई अनुभव और भी हुए, जिसमें खास तौर पर ऐसे समय पर मानव ह्रदय कि कोमल भावनाओं को देखा, मीडिया का गिद्ध स्वाभाव देखा, और कई लोगों कि मूर्खता भी देखी।

सबसे महत्वपूर्ण भावना रही वो ये कि इस घटना ने जीवन कि क्षणभंगुरता पर फिर भरोसा दिला दिया। मैंने अपने रिश्तेदारों में दादा, दादी और नाना कि मृत्यु अपने सामने देखी और इनके अन्तिम संस्कार में भी गया हूँ। काफी पहले हुए इन अनुभवों ने मुझे थोड़ा मज़बूत बनाया है। लेकिन तीन साल पहले मेरे कई कम उम्र रिश्तेदारों में कुछ कि मृत्यु हुई, जिसने जीवन पर भरोसा कम किया था। उसके बाद शादी हुई और जीवन के आनन्द में फिर भूल गया, "जीवन कि क्षणभंगुरता।"

इस घटना ने झकझोर दिया, बार बार दिल में यही ख़याल आता रहा कि क्या सोच के निकले होंगे घर से लोग सबेरे सबेरे, कि आज ये पढ़ना है, ये मीटिंग है, यहाँ लंच है, इससे मिलना है, शाम को सिनेमा देखना है और ना जाने क्या क्या क्या। एक बार भी दिल में ये ख़याल किसी के नहीं होगा कि ऐसा हो सकता है। सब पढ़ने वाले, समझदार, शांतिप्रिय लोग।

कई बार दिल में ये ख़याल किया कि मरने का क्या अर्थ है, क्या इसके लिए इन्सान को तैयारी करनी चाहिऐ, अगर करनी चाहिऐ तो क्या? जैसे जैसे मृतकों में जान पहचान वालों के नाम आने लगे, शोक बढ़ता गया, और इन सवालों के जवाब में दिमाग खराब होता गया। बुधवार को नोरिस २०६ कमरे में मृत हुये लोगों कि एक शोक सभा में गया। उस कमरे में घटना के समय १४ लोग थे। ४ छात्र घायल होकर भी बच गए, एक छात्र उस दिन कालेज नहीं आया, और एक छात्र ने एक हफ्ते पहले ही वो कक्षा छोड़ दी थी।

उन मृत लोगों में डॉ॰ लोगानाथान, और मेरे विभाग कि एक छात्रा भी थी, जिससे मैंने जिन्दी में पहली बार शुक्रवार को बात की थी। बार बार यही सोचता रहा कि उस दिन भी मेरी बात क्यों हुई उस लड़की से, इसके पीछे क्या दैवीय योग रहा होगा? शोक सभा में कई लोगों ने अपने संस्मरण सुनाये, डेढ़ घंटे कि वो सभा भावनात्मक रुप से बहुत मुश्किल हो गयी थी। जब मैंने इतने लोगों को संस्मरण सुने तो फिर बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो गया, मगर क्या, ये बयां कर पाना मुश्किल है।

दिन का अंत होते होते, कम से कम ऎसी तीन शोक सभाओं में शिरकत कर ली थी। अन्तिम सभा एक मंदिर में हुई जहाँ कई भारतीय छात्र इकट्ठा हुए और उन्होने कुछ समय भजन में बिताया। इस सभा में कुछ मित्रों ने मीनल और डॉ॰ लोगानाथान के बारे में बात की। उस भावनात्मक रुप सी कठिन सभा में कुछ उद्गार मेरे ह्रदय से भी निकले, जिनको मैं लगभग वैसा का वैसा यहाँ प्रस्तुत कर रह हूँ।

"डॉ॰ लोगानाथान एक बेहतरीन प्रोफेसर थे, उन्होने मुझे एडवांस्ड हाइड्ररोलॉजी पढ़ाया हैपढ़ाने के प्रति उनका समर्पण कक्षा के हर एक छात्र को महसूस होता थाअपने विषय के बारे में उनको बहुत ही सूक्ष्म स्तर कि जानकारियां थीपढ़ाने का उनका एक अलग ही तरीका था, और आप उनकी कक्षा में कभी अलग थलग नहीं महसूस कर सकतेउनका इस बात पर पूरा जोर रहता था कि छात्रों को विषय पूर्णतः समझ आयेडॉ॰ लोगानाथान जैसे व्यक्ति सदैव अपने छात्रों, मित्रों, और रिश्तेदारों की प्रेरणा में जीवित रहते हैंआज मैं भी जब पढ़ाता हूँ तो पार्श्व में डॉ॰ लोगानाथान जैसा पढ़ाने कि इच्छा मन में रहती हैउनकी ही तरह अपने विषय को पूर्णतः समझने कि इच्छा रहती है

मीनल के बारे में जैसा कि आप लोगों में से कुछ ने बताया (मुझसे पहले जिन लोगों ने उसके बारे में बताया) की उसकी खास बात उसके चहरे पर रहने वाली मुस्कान थी, चाहे कोई भी परेशानी होमीनल आपके चहरे पर रहने वाली मुस्कान की प्रेरणा के रुप में सदा आपके ह्रदय में रहेगीयही जीवन की निरंतरता हैजीवन के सफ़र में खो चुके लोगों की प्रेरणा दायक बातों को अपने ह्रदय में रख कर आप मृतक की आत्मा को सदा शांति प्रदान करेंगे।"

कहना और भी बहुत कुछ चाहता था। इन लोगों के बारे में जो कहा वो बिल्कुल नाकाफी था, मगर और कह नहीं पाया। शनिवार को डॉ॰ लोगानाथान कि शोक सभा में गया जहाँ उनके महान जीवन का जश्न मनाया गया। ६०० से ऊपर लोगों की सभा में अपनी भावनाओं को काबू कर पाना मुश्किल हो गया था। उस सभा के बारे में रीडिफ़ में छपा भी है। शनिवार को ही बाल्टिमोर में मीनल का अन्तिम संस्कार था, मगर मैं उसमें नहीं जा पाया, क्यूंकि मैं ब्लैक्स्बर्ग में डॉ॰ लोगानाथान कि शोक सभा में था। इस दर्दनाक घटना को एक हफ्ते हो चुके, मगर दिल अभी भी अशांत है। कल जा कर कालेज द्वारा उपलब्ध कराए गए किसी काउन्सेलर के पास जाऊंगा।

इस घटना ने जो बहुत सी बातें सिखाईं हैं उनमें से कई पर अभी बहुत कुछ लिखना है, खास कर मीडिया के गिद्धपने पर।

राग

9 टिप्पणियाँ:

अतुल शर्मा said...

सही है कि जीवन क्षणभंगुर है। दार्शनिकों ने कहा है कि हर दिन जीवन का अंतिम दि समझ कर जिएँ, परंतु आम आदमी के लिए ये संभव नहीं है।

अफ़लातून said...

आप का यह लेखन अन्तत: आपको शक्ति देगा ।

mahashakti said...

आपके द्वारा बतायी एक एक बात ऑंखों मे पानी ला रहा था, भले ही वहॉं कोई अपना न था पर जो भी थे वो अपनों से कम न था।

सभी मृतात्‍माओं को हार्दिक नमन। और इस उस समय उपस्थित प्रत्‍यक्ष दर्शीयों के हृदय को भगवान बल प्रदान करें।

Udan Tashtari said...

यह एक कठिन और दुखद समय है. बस इतना ही कह सकते हैं कि इस दुखद घड़ी में हम आपके साथ है. धीरज से काम लें.

masijeevi said...

जीवन वाकई ऐसा ही है।

eSwami said...

अनुराग,

काश ये घटना ही ना हुई होती!

एक बात कहनी होगी आप और आपके केंपस के और ब्लागर्स बहुत कठिन संतुलन साध रहे हो.
घटना को बाहर से देखने, उसका हिस्सा बनने और स्वयं पर हुए प्रभाव सारे परिपेक्ष्य अच्छे से बारी बारी रख रहे हो. अंग्रेजी के कई ब्लागर्स ने भी बहुत समझदारी से अपनी बातें रखीं. काश मीडिया वाले कुछ सीखें!

Mired Mirage said...

अपना दुख व अनुभव हमारे साथ बाँटने के लिए धन्यवाद । ऐसे ही लिखते रहें । दुख बाँटने से मन हलका होता है ।
घुघूती बासूती

नीरज दीवान said...

आपका अनुभव पढ़कर मेरी आंखे छलछला उठी हैं. जो कल तक अपने साथ थे..एकाएक अपने बीच वो नहीं दिखेंगे. मेरे पास शब्द नहीं है. इस तरह की घटना झकझोर कर रख देती है.
मुझे इस बात से भी हैरत होती है कि इस तरह के शूट आउट कर किसी को क्या मिलता है? इन मानसिक रोगियों का रोग दूर किया जाना चाहिए. हिंसा किसी समस्या का हल क़तई नहीं सकता. क्षोभ होता है मुझे.
आपने दुख बांटा.. आपके साथ जो कुछ हुआ.. वहां जिन लोगों के अज़ीज़, यार दोस्त रिश्तेदार आज शोकमग्न है.. मेरी संवेदनाएं उनके साथ हैं. दुनिया में कहीं कोई इस हिंसा का शिकार होता है. मैं सोचता हूं कि सियासी तानेबाने में हम नाहक फंस रहे हैं. हमें शांति चाहिए.. हम ऐसी दुनिया में कैसे रहेंगे, हमारी अगली पीढ़ी कैसे रहेगी.
किंतु हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि हमारे बीच कोई ऐसा न हो जो उस मानसिक अवस्था तक पहुंच जाए जो शूट आउट का कारण बना. हमें समतामूलक समाज की ओर बढ़ना होगा.
अनुराग भाई, मैं आपके अगले लेख का इंतज़ार कर रहा हूं. उम्मीद है आप मीडिया के गिद्धपने पर बेबाकी से लिखेंगे.

Sumit said...

Its a very sad time for VT, and our prayers are with you guys. Take care Anurag