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Saturday, June 02, 2007

हम अपनेआप को क्या समझते हैं?

अभी थोड़ी देर पहले रवि रतलामी जीं के चिट्ठे पर ये विषय पढ़ा जिसमें लेखक हमसे ये पूछ रहे हैं कि हमें किस बात का घमंड है? बहुत सोचा, बहुत सोचा पर कुछ खास समझ नहीं आया तो स्वदेस फिल्म का यू ट्यूब से विडिओ खोजा। मूवी तो आपने देखी ही होगी मगर ये दृश्य बढ़िया रहेगा, याद ताज़ा करने के लिए। मेरे ख़याल से ये दृश्य इस फिल्म का मुख्य दृश्य था। आपने फिल्म देखी हो या ना देखी हो पर इस विडिओ के शुरू के पांच मिनट ज़रूर देखिए। शायद रवि जीं के चिट्ठे पर पूछे गए सवाल का जवाब भी मिल जाये।



अभी आज सुबह किसी को भारत में फ़ोन किया, तो उन्होने बताया कि उनका दिल्ली जाने का कार्यक्रम रद्द हो गया है, क्यूंकि माहौल खराब है, गुर्जरों के विरोध के कारण। मैंने उनसे कहा कि हिंदुस्तान में सब बौरा गए हैं क्या कि कोई भी समस्या हो, सब राशनपानी लेकर सड़क पर उतर जाते हैं और तोड़ फोड़ चालू हो जाती है। उन्होंने जवाब में कहा कि ये तो सब जगह है अब अमेरिका में ही किसी ने धमकी दी है कि वो ९/११ वाले आक्रमण से कुछ बड़ा करेगा और वर्जीनिया टेक में हुई घटना से कुछ बड़ा करेगा। और जो ये सब करेगा वो एक अमेरिकी ही है। उन्होने कहा कि भारत में तो यह समाचार में ख़ूब आ भी रहा है।

मुझे लगा कि जिस खबर कि अमेरिका में कुछ खास क़दर नहीं है, उसे भारत में क्यूँकर लगातार दिखाया जा रहा है पता नहीं (वैसे ये कुछ दिन पुरानी खबर है)। और इसके अलावा ये कि इस बात का मेरी कही बात का इस बात से क्या संबंध है? किस बात का हमें घमंड है हमें जो हम अपनी कमियाँ नहीं स्वीकार करते या करना चाहते?

राग

हम अपना दरवाज़ा बंद कर लें और तुम अपना

किसी हिंदु मंदिर में अब ग़ैर हिंदुओं का आना मना कर दिया गया है असम में हिंदी भाषियों का रहना मुहाल हो रहा है। कभी कभी महाराष्ट्र में दूसरे राज्य वालों को निकालने कि बात आती है, ब्रिटेन में इतने सालों से बसें डॉक्टरों के अब वहाँ बसे रहने में समस्या शुरू कर दी गयी है।

जाने अब हम खुद को क्या समझने लगे हैं?

मनुष्य तो प्रकृति से ही यायावर है। यही कारण है कि इतने तरह के लोग दुनिया भर में बसें हैं। एक वृत्तचित्र देख रहा था जर्नी ऑफ़ मैनअब ये वृत्तचित्र मुख्यतः एक शोध है जो ये बताने का प्रयास करता है कि किस प्रकार मनुष्य कि शुरू की प्रजातियाँ अफ्रीका से दुनिया के और हिस्सों में फैली। इस वृत्तचित्र का पहला हिस्सा यू ट्यूब से यहाँ दिखाया है, बाक़ी के सारे हिस्से यू ट्यूब पर ही उपलब्ध हैं।



इन्सान का इस प्रकार घूमना या यायावर होना ही उसकी प्रजाति के सफल होने का कारण रहा है। यद्यपि अब हमारे पास लाजवाब तकनीकें आ गयी हैं यात्रा करने के लिए और कहने को धरती छोटी हो गयी है, लेकिन हमारा दिमाग उससे भी ज्यादा छोटा हो गया है। देश की सीमायें बना के हमने लोगों के रहने और बसने की सीमायें तो निर्धारित कर दीं हैं, लेकिन हमारा सोच का छोटा होना उससे भी नहीं रुका। अब हम लोगों को अपने राज्य में नहीं घुसने देना चाहते, मोहल्ले में नहीं घुसने देना चाहते, अपने मंदिर और मस्जिद में नहीं घुसने देना चाहते।

जाने क्या लगता है ऐसे सीमायें बनने वालों को? क्या पृथ्वी के उत्थान से हिंदु, मुसलमान या कोई और धर्म था? ये देश और राज्य की सीमायें हज़ारों लाखों साल से क्या ऐसी ही हैं? ये सब सीमायें हमारे जैसे इंसानों की ही बनाई गयी हैं और हम ही इसे बदल भी सकते हैं। धर्म से इसलिये भी मुझे नफरत हैं क्यूंकि ये बताता है की एक इन्सान दूसरे से अलग क्यों और कैसे है, इस बारे में पहले एक बार मैं यहाँ लिख चुका हूँ

जब तक ये मूर्खतापूर्ण बातें आम लोगों के दिलों में सीमा ना बनायें तब तक तो अच्छा है, लेकिन दुर्भाग्य की, ऎसी छोटी बातें धीरे धीरे आम लोगों के दिलों में भी दीवार बना लेती हैं....

राग

Tuesday, April 03, 2007

चलो नेतागिरी करें

दो दिन पहले उप्र के चुनाव कि कवरेज सुन रह था बीबीसी में. जी उकता गया सच में. सोचा कि जिन मुद्दों को मैं थोड़ा सा भी महत्व देता हूँ, उसकी क्या कीमत है आज?

  • सूख रही है गंगा? सब बकवास है? (या फिर सवर्णों या ईसाईयों का झूठा प्रचार है )
  • ग्लोबल वार्मिंग? यह क्या है?
  • मरता हुआ किसान? अमेरिका से अनाज सकता है ना!
  • प्राथमिक शिक्षा? सब पढ़ गए तो हमें वोट कौन देगा?
  • उच्च शिक्षा? जाओ ना पढ़ने विदेश फिर?
  • समाजिक बराबरी? आरक्षण का लेमन चूस दिया ना? चूसो?
  • बिजली? जो आज तक ना रही उसके बारे में क्या उम्मीद करो?
  • भ्रष्टाचार? ये भी कोई मुद्दा है?
  • शोध? क्यों? हमें तो सब पता हैं ना?
  • एड्स? श्श्श्श्श्श्श्श
एक छोटी से कविता लिख दी इस मुद्दे पर, माफ़ कीजियेगा

चलो नेतागिरी करें
तुम जाती का मुद्दा उठाओ,
हम गरीबी का उठाते हैं

तुम मंदिर बनाओ,
हम कहीँ मदरसा खङा करवाते हैं
तुम जुर्म कि गिनती कराओ
हम गबन कि करवाते हैं

चलो नेतागिरी करतें हैं

अब क्या करना इस बात से कि
किसान मर रहे हैं
सरपंच से कह कर उनके वोट तो पड़ ही जाते हैं

अब क्या करना इस बात से कि
गंगा गन्दी हो रही है
कुम्भ में नहाते वक्त
पानी ही तो छोड़ना होगा बाँध से
और फिर हो जाएगा हर हर गंगे

क्या मतलब इस बात से कि
सूख रही गंगा,
नहीं कर पाएगी भरण पोषण
इस सूखते हुए राज्य का।
बंगलादेश से मँगा लेंगे कुछ और वोटर

बिजली अब कोई मुद्दा नहीं
सबके पास जनरेटर है
नहीं तो एक इनवर्टर है
वैसे एक घंटे भी रहेगी बिजली तो
अमिताभ प्रचार कर ही देगा

भ्रष्टाचार कोई मुद्दा रहा नहीं
एक ही तो हम्माम है
सब ही हैं इसमें नंगे
हम राजा तो तुम्हारी जांच
तुम राजा तो हमारी जांच

यह खेल भी बड़ा निराला है
सबको मंत्रमुग्ध कर डाला है
फिर गद्दी पर आएंगे
कुछ और भी खेल दिखायेंगे

आओ वोट माँग के आते हैं,
कुछ और भी रंग दिखाते हैं

चलो नेतागिरी फैलाते हैं

राग

Saturday, March 10, 2007

आरक्षण के मुद्दे के जवाब पर कुछ जवाब

प्रदीप जी ने मेरे पिछले लेख पर कुछ टिपण्णी की। प्रदीप जी पहले तो इतनी लंबी टिपण्णी का धन्यवाद कि आपने अपना पूरा पक्ष सामने रखा है। मैं बड़ी पोस्ट नहीं लिख पाता, तो कोशिश करूंगा कि छोटे में अपनी बात कह सकूं।

सबसे पहले तो मैं यह साफ कर दूं कि समाज के समान रुप से विकास को मैं स्वयं सबसे बड़ी प्राथमिकता देता हूँ। आप बहस का दायरा बिना छोटा किये भी अपने बिन्दु स्पष्ट कर सकते हैं। यह शत प्रतिशत सही है कि सवर्णों ने कई सदियों से नीची जाती के लोगों का शोषण किया है, और यही एक बड़ा कारण है कि इन जातियों कि समाज में हिस्सेदारी बहुत कम है। जब आरक्षण आजादी के बाद लगाया गया था, तब भी समाज कि संविधान निर्माताओ कि यहीं धारणा थी। किन्तु पिछले ५०-६० सालों में हमारा समाज बड़ी तेजी से बदला है और विकासोंमुखी हुआ है।

इस बदलते समाज में जिसमें मौका छीनने की कूवत थी, या जिसे मौका मिला वो आगे बढ़ गया। जिनको मौका नहीं मिला या नहीं मिल पाया वो पीछे रह गए। मौका ना मिल पाने का कारण गरीबी, अशिक्षा, जाती व्यवस्था, सरकार कि पूरे देश तक बराबर विकास कर पाने कि नाकामी, आदि कई कारण थे. उदाहरण के तौर पर; सब लोग जानते हैं कि उत्तर पूर्वी राज्यों में सरकार का कैसा रवैया है और वो जगहें बाकी देश तक से पीछे रह जा रही हैं। अब अगर वहाँ का कोई बाशिंदा समाज में आगे नहीं बढ़ पाया तो उसका ज्यादा बड़ा दोष वहाँ कि सरकारी नीतियाँ रहेंगी, ना कि उसकी जाती।

खैर यहाँ तक तो वो बातें थी जिसपर हम दोनों, या और भी कई लोग सहमत हैं। आपने ये पूछा कि कोई ठोस विकल्प भी होना चाहिऐ, अगर हम वर्तमान व्यवस्था का विरोध करते हैं। जो मैं सुझाव देने जा रहा हूँ, ये मात्रा एक छोटा सा खांचा है जिसको बहुत सारे तरीकों से प्रस्तुत किया जा सकता है, बढ़ाया जा सकता है, और लागू किया जा सकता है। इन सुझावों को आप या कोई भी बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें, इसे ये देख कर ना पढ़ें कि इसे किस जाती के आदमी ने लिखा है। बस ये सोच के पढ़ें कि इसे एक देशभक्त ने लिखा है जो आपकी ही तरह पूरे समाज कि उन्नति चाहता है।

१ सभी प्राथमिक, उच्च और शोध विद्यालयों और विश्विद्यालयों में २५% आरक्षण गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए। अब इसको २५ कि जगह २० या ३० या ४० किया जा सकता है मगर वो मेरे कार्यक्षेत्र से बाहर का फैसला है। इस फैसले को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा सकता है, और लोग बेईमानी ना कर सकें नकली प्रमाण पत्र बनाकर इसका भी प्रावधान किया जा सकता है। और भी कई हिस्से जोड़े जा सकते हैं अधिक शोध करके।

२ गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले प्रत्याशियों से फ़ीस ना ली जाये, और उनके लिए वजीफे के बंदोबस्त भी किये जाएँ।

३ भारतीय नागरिकों के मूल अधिकारों में प्राथमिक शिक्षा का अधिकार जोड़ा जाये (अब इसके लिए बुनियादी ढाँचे का रोना नहीं रोया जा सकता)

३ सभी प्राथमिक शिक्षकों की तनख्वाह और मिलने वाले मुआवजे में वृद्धि। प्राथमिक शिक्षक के कैरीयर को ज्यादा आकर्षक बनाया जाये।

४ भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में सीटें बढ़ाने का फैसला सही है, और उसे किया ही जाना चाहिऐ (बल्कि इस फैसले को लगाने में हम कई साल पीछे हैं ), किन्तु चरणबद्ध तरीके से और योजनाबद्ध तरीके से (ये तो ज़रूरी है ही, चाहे आरक्षण हो या ना हो)

और भी प्रावधान किये जा सकते हैं, जोड़े जा सकते हैं जिसे सामान्य ज्ञान अनुमति दे।

क्या ये योजना ठीक है, या फिर जाती के आधार पर समाज को बांटने कि साजिश, ऐसे लोगों द्वारा जिन्हें समाज के विकास से ज्यादा अपने वोट बैंक की ज्यादा चिंता है, या फिर इतिहास कि किताबों में अमर हो जाने की चिंता??

राग

अपनी बात कहते हुए मेरे दिमाग में एक बात और आयी कि कॉङ्गरेस कि सरकार ने शिक्षा के मुद्दे को मूल अधिकारों में जोड़े जाने कि बात नहीं की, और इसका दोष हमेशा बुनियादी ढाँचे कि कमी को बताया गया, मगर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण कि बात हुई तो कहा गया कि सभी शिक्षण संस्थानों में साल में इंतज़ाम कर दिया जाएगा, और इसके लिए खीसें से ३५ हज़ार करोड़ रुपये भी निकल आये...

भारत पुनर्निमाण दल की आने वाले चुनावों कि तैयारी

संपादित: ये घोषणा छपी है भापुद के जालस्थल पर उप्र के चुनावों के संदर्भ में।

जैसे कि आपमें से कइयों ने पढ़ा और सुना कि मैंने भारत पुनर्निमाण दल के उपाध्यक्ष श्री रवि किशोर जी का साक्षात्कार लिया था जो कि मैंने यहाँ पर पोस्ट किया है। रोजाना कि हिट्स से तो लगा कि काफी लोगों ने इस साक्षात्कार को सुना या पढ़ा है। खैर भापुद ने उत्तर प्रदेश में चुनावों में उतरने कि घोषणा कर ही दी है करीब २५-३० सीटों पर प्रत्याशी घोषित किये गए हैं। लखनऊ से भापुद के अध्यक्ष श्री अजित शुक्ल ही चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं।

कभी कभी लगता है कि देश को नयी पार्टी कि क्या ज़रूरत है, लेकिन साथ ही ये भी एहसास होता है कि अगर कल को वोट देने जाऊं तो किसे दूंगा वोट? कॉंग्रेस, बीजेपी, सपा, या बसपा ? नए विचारों से भरी हुए नए लोग ज़रूर ही कुछ नयी चीज़ें लेके आएंगे और कुछ नया करने कि हिम्मत भी। कम से कम अब ७०-८० साले के वृद्ध लोगों से शासित होने कि इच्छा तो बिल्कुल भी नहीं है।

खैर मेरी तो इस नयी पार्टी को शुभकामनाएं हैं। अगर उप्र में होता तो साथ भी ज़रूर देता इन लोगों का। मुझे रवि से साक्षात्कार में उनकी कुछ कही हुई बातें खास तौर पर पसंद आयी जिसे में यहाँ वैसा का वैसा अनुवादित कर दे रहा हूँ, अर्थ आप स्वयं लगायें :)।

"भारत का विकास आजादी के बाद से कोई बहुत योजानाबद्ध तरीके से नहीं हुआ है"

-ये समझाते हुए कि भारत पुनर्निमाण दल के नाम का मतलब क्या है

"राजनीति में आने के लिए प्रेरित होना मुश्किल नहीं है... प्रेरणा बड़ी आसानी से जाती हैहमारे देश की जनसंख्या अरब है, और ज़रा सदन में बैठे ५४३ लोगों को देखो या किसी भी राज्य कि सदन में बैठे लोगों का विश्लेषण करोअपने आप को ये समझाना बड़ा आसान है कि हम इनसे बहुत बेहतर नेता दे सकते हैं"

-राजनीति में आने कि प्रेरणा के बारे में पूछने के बारे में

"तंत्र इतना भ्रष्ट है और कोई इसके लिए कुछ नहीं कर रहा है, ये अपने आप में एक प्रेरणा है"

-ये पूछने पर कि इतने भ्रष्ट तंत्र में घुस कर लड़ने कि प्रेरणाशक्ति कहाँ से आती है


राग

Friday, March 09, 2007

आरक्षण - पुनः बढ़ती बहस

चूंकि अब खबर थोड़ी पुरानी होती जा रही है इसलिये इस मुद्दे पर बहस भी कम होती जा रही है, किन्तु आरक्षण का मुद्दा आज भी वहीँ पर है जहाँ करीब ६-७ महिने पहले था। सर्वोच्च न्यायालय में इस पर बहस अब पूरी हो चुकी है और न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा हुआ है।

यद्यपि अकल से देखा जाये तो ये आरक्षण का मुद्दा पूर्णतया मूर्खता भरा है लेकिन ये मनमोहन जी कि सरकार जो ना कराए वो थोड़ा ही है। आरक्षण के अनुभव को एक सफल अनुभव मानने वाले एक समाजशास्त्री श्री योगेंद्र यादव जी भी यही मानते हैं कि इस प्रकार आरक्षण लगाना मूर्खता है इकॉनोमिक टाइम्स में इस सिलसिले में बढ़िया रिपोर्ट है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं इसमें बताया गया है कि अदालत कैसे इस सरकार से फिर वही सामान्य ज्ञान के सवाल पूछ रही है कि कैसे १९३१ के आधे अधूरे आंकणे को इस्तेमाल करते २००७ में आरक्षण लगाया जा रह है? क्या जल्दी थी कि सरकार ने ज़रूरी जानकारी जुटाना उचित नहीं समझा?

आरक्षण कि मूल भावना से मुझे भी कुछ गुरेज नहीं है। समाज के पिछड़े तबके को मौका दिया जान चाहिऐ कि वो आगे बढ़ सके, लेकिन इसके लिए "जितने काले सब मेरे बाप के साले" वाला तरीका क्यों अपनाया जा रह है ये मेरी समझ के बाहर है। पिछड़ापन गरीबी और अशिक्षा के कारण आता है, जहाँ तक जाती का मुद्दा है, ये बात ३०-४० साले पहले सही थी, मगर अब उतनी सही नहीं रही। एक व्यक्ति जो कि जाती से ब्राह्मण है अगर वो गरीब है तो अपने बच्चे को बड़े संस्थान में नहीं पढ़ा सकता, मगर एक रईस आदमी चाहे किसी भी जाती को अपने बच्चे को जितने चाहे मौक़े दिला सकता है।

फिर सोचता हूँ कि ये बातें मैं क्यों कर रह हूँ ? ये तो सामान्य ज्ञान कि बातें हैं, जो कब्र में पैर लटकाए अर्जुन सिंह जैसो को क्यों समझ आएगी, जिनको मरते मरते मसीहा बन के मरना है। सठियाने कि उमर से आगे जाके लोग हम पर राज करके हमारे चहरे पर चपत लगा रहे हैं और हम देख राहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय कि बात जोह रहे हैं, कि शायद उसी से अब उम्मीद बची है। विकास कि बात तो छोड़ो ये सरकार सामान्य ज्ञान को धता बता रही है। एक तरफ विकास के नाम पर बिना ठीक से मुआवजा दिए जमीन छीनती है गरीबों की और ऊपर से आरक्षण का लोलिपोप दिखाती है।

खैर मैं बेसब्री से सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय का इंतज़ार कर रहा हूँ, आप भी करिये (और कर भी क्या सकेंगे?)

राग

Friday, February 16, 2007

भारत पुनर्निर्माण दल के नेताओं से मुलाकात

इस शनिवार को वर्जीनिया टेक के भारतीय कार्यक्रम में मैं आप लोगों की मुलाकात कराऊँगा एक नये राजनैतिक दल "भारत पुनर्निर्माण दल" के नेताओं से। जैसा कि मैंने अपने चिट्ठे में पहले इस दल के बारे में आप लोगों को बताया था, ये भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों के मेधावी छात्र हैं जिनकी रुचि राजनीति में आ कर देश के लिए कुछ करने की है। आपसे अनुरोध है कि कार्यक्रम को सुनें और इन मेधावी छात्रों का हर तरह से मनोबल बढ़ाएं।


कार्यक्रम अमरीका के पूर्वी समय के अनुसार दोपहर १:०० बजो से २:३० बजे तक, और भारत के रात ११:०० बजे से सुबह १:०० बजे तक सीधा प्रसारित किया जाएगा। सुनने के लिए इस कड़ी पर जाएँ और "Listen Online" पर चटका लगाएँ।

अनुराग


कार्यक्रम के बारे में अधिक जानकारी

Thursday, February 01, 2007

भारत: आंदोलन के लिए तैयार छात्र

आपमें से कइयों ने एक नयी राजनैतिक पार्टी का बारे में सुना होगा, जिसका नाम है "भारत पुनर्निर्माण दल।". इस आलेख में मैं आपको इस नये दल के बारे में बताना चाहूँगा और ये भी कि मैं इस नये दल के बारे में क्यों उत्साहित हूँ।

इस दल की ये विचारधारा है कि समाज की सारी समस्याओं की जड़ है, भ्रष्ट राजनीति, जो कि मेरा भी मानना है। एसा सबने महसूस किया होगा कि एक आम आदमी जिसमें देश के लिए कुछ भी करने की इच्छा हो, राजनीति में नहीं आना चाहता। राजनीति को कभी भी एक करियर की नज़र से नहीं देखा जाता। किसी में अगर राजनीति में जाने की इच्छा भी हो तो वो कोशिश नहीं करना चाहता, राजनीति के अपराधीकरण के कारण।

मेरा उत्साह मुख्यतः इस कारण से है कि ये दल छात्रों का बनाया हुआ है, और छात्र भी भारत के नामी गिरामी संस्थानों के। छात्र जो युवा हैं, उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, और जिनकी आँखों में सपने हैं वे देश के लिए चमत्कार कर सकते हैें। जहाँ तक मैं देख रहा हूँ, इस दल को मीडिया में ज्यादा महत्व नहीं मिल रहा है, शायद इसलिए कि ये दल नया है और ज्यादा मसालेदार खबरों का स्रोत नहीं है। हमारे लिए आवश्यक है कि हम इनका उत्साहवर्धन करें। नीचे इस दल के बारे में एक-दो कड़ियाँ हैं।

सी एन एन : आई बी एन
द टाइम्स ऑफ इंडिया

मैं उन्हें अपने रेडियो कार्यक्रम में शामिल करने का भी प्रयास करूँगा, ताकि इन छात्रों और भविष्य के राजनेताओं की ज्यादा से ज्यादा लोगों से मुलाकात करा सकूँ।ऑरकुट, में भी कुछ इनके नाम से समुदाय बने हुए हैं।

संपादित: मैंने भापुद के अध्यक्ष, श्री अजीत शुक्ला को 17 फरवरी के अपने कार्यक्रम में आमंत्रित कर लिया है। विवरण की प्रतीक्षा करें।

इतिहास गवाह है कि बड़े आंदोलन और सामाजिक बदलाव छात्रों के ही माध्यम से हुए हैं। ना भरोसा हो तो नीचे का विडियो देखें।



अनुराग

Wednesday, July 05, 2006

सरकार या सरकस

भारतवर्ष की यूपीए सरकार को देखकर ऐसा ही लगता है। जिसकी जो मर्जी़ आए वही करता है। कुछ दिन पहले अर्जुन सिंह को अचानक सामाजिक न्याय का भूत सवार हुआ और उन्होंने आरक्षण का शगूफ़ा छोड़ दिया। नतीजा सबके सामने है। मीरा कुमार को लगा की वो कहीं सामाजिक न्याय की रेस में पीछे ना छूट जाए तो उन्होंने खुलेआम सभी निजी कंपनिओं को अपने यहाँ आरक्षण लगाने की धमकी दे डाली।

किसी तरह इन सब पर भी देश चल रहा था तो एकदम बेकाम स्वास्थ्य मंत्री ने एम्स के निदेशक को बर्खास्त कर दिया। अब स्वास्थ्य मंत्री के सामने एम्स के निदेशक की काबिलियत की क्या बात कहें। बस इतना काफी है की दिल के डाक्टरों में वे भारत में सर्वोत्तम माने जाते हैं, हाँ अलबत्ता कोई चुनाव नहीं जीते हैं बेचारे।

अब इसे स्वास्थ्य मंत्री जी की बदले की कार्रवाई ना समझें तो क्या कहें? उधर सरकार हड़ताल से लौटे डाॅक्टरों को तनख्वाह नहीं दे रही है, जो की सीधे सीधे उच्चतम न्यायालय की आज्ञा की अवहेलना है।

जब ये सरकार उच्चतम न्यायालय को ठेंगा दिखा सकती है तो हम और आप हैं ही क्या?

प्रधानमंत्री जी की तो क्या ही सुनाएं? मेरी नज़र में वे भारत के हर नागरिक की बेबसी और मूर्खता के जीते जागते उदाहरण हैं। बेशर्मी की हद ये की विदर्भ में इतने किसानों की आत्महत्या के बाद वहाँ जाकर थोड़ा मलहम लगाकर बोले की सिर्फ़ खेती से कुछ नहीं होगा, किसानों को और भी धंधे करने चाहिए। इतने होनहार प्रधानमंत्री से ये बात सुन के शर्म तो आती ही है, बेबसी ज्यादा महसूस होती है।

मूर्खता का तमाशा करती ये सरकार ना जाने कब तक हमारे सर पर सरकस करेगी?

अनुराग