Thursday, November 23, 2006

धर्म, भगवान, धर्मांतरण, मैं और आप

पिछले कई सालों से और कई रूपों में मैने इन शब्दों का सामना किया है, मगर इनका मीमांसा करने से बचता ही रहा हूँ। न खुद को समझाने की कोशिश की, ना किसी दूसरे को (कहीं उसकी "धार्मिक" भावना को ठेस ना लग जाए)।

ये विचार मेरे मन में लेकिन कई तरह से आते ही रहे हैं, तो अब अपनी समझ के अनुसार मैने इनकी विवेचना करने का निर्णय ले ही लिया। आगे बढ़ने से पहले मैं ये साफ कर दूँ कि भगवान पर मेरा पूर्ण विश्वास है और मेरा ये मानना है (जानना नहीं) कि कोई शक्ति है जो कई रूपों और गुणों में सर्वत्र विद्यमान है और हमको चला रही है। इस शक्ति का नाम हम फिलहाल "भगवान" ही मान लेते हैं।

ये भगवान जितना सब जगह है उतना ही हमारे और आपके अंदर है। जब किसी रोते को देखककर आपमें दयाभाव जगता है तो आपके अंदर का भगवान प्रकट हो जाता है। मात्र यही है मेरी और मेरे भगवान की परिभाषा। अहम् ब्रह्मास्मि।

अब आती है भगवान की परिभाषाओं की बात। जहाँ तक मेरा मानना है भगवान (या उसकी परिभाषाएँ) इंसान का आविष्कार हैं, ताकि वह अपनी सीमित दिमाग की समझ से बाहर की चीज़ों को परिभाषित कर सके। ये दुनिया, ब्रह्मांड, जीवन, मृत्यु, प्रकृति आदमी की समझ के बहुत बाहर है, और इंसान हमेशा से इन चीज़ों को समझने की कोशिश करता रहा है। इन्हें समझने के लिए इंसान ने ना सिर्फ भगवान का आविष्कार किया बल्कि उसे शक्ल देने की कोशिश भी कि।

राम, कृष्ण, जीसस ये सब असाधारण व्यक्तित्व और प्रतिभाओं वाले साधारण मनुष्य थे। मगर उनका वर्णन और विवरण करने वाले लेखकों ने, भक्तों ने, अनुयायियों ने इनको महापुरुष और फिर भगवान का रूप दे दिया। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था, लेकिन फिर इन महापुरुषों की बातों का अनुपालन करने वालों का एक धर्म का अनुयायी मान लिया गया। संस्कृतियों को धर्म के नाम से बाँट दिया गया और ये तय कर दिया गया कि एक आदमी दूसरे से अलग कैसे है।

धर्म के नाम पर रोटी सेकने वालों की मौज हो गई। इतिहास गवाह है कि बड़े बड़े धार्मिक संस्थान भ्रष्टाचार के गढ़ रहे हैं। धर्म डर दिखाने का एक अच्छा माध्यम भी है, भेंड़चाल से चलने वालों लोगों को चलाने का एक बढ़िया माध्यम भी मिल गया। धर्म को नैतिक आचरण परिभाषित करने का भी जरिआ बना दिआ गया। जो हो गया, सो हो गया, लेकिन सैकड़ों, हजारों साल पहले स्थापित, परिभाषित किए गए नियमों से आज भी समाज को हाँकने का प्रयास किया जाता है। समय के साथ समाज का नियम और आचरण भी बदलते हैं, लेकिन धर्म के तथाकथित ठेकेदार आज भी चाहते हैं कि दुनिया पुराने नियमों के अनुसार आचरण करे और धर्माधिकारियों और भगवान से डरे। जो अपने नियम बनाए और आधुनिक विचारों से चले वो नास्तिक, भ्रष्टाचारी और ना जाने क्या क्या।

कई धर्माधिकारी अपने अनुयायियों पर जोर देते हैं कि वो ज्यादा बच्चे पैदा करें, फिर चाहे पृथ्वी की अतिशय संसाधन दोहन से कमर टूटती है तो टूटती रहे, लेकिन "मेरे जैसा धर्म" मानने वाले की संख्या बढ़ती रहे। कई धर्माधिकारी कपड़े पहनने के नियम भी परिभाषित करते हैं, फिर चाहे पहनने वाले की मर्ज़ी हो या ना हो। कुछ जगह तो संसर्ग करने के नियम भी तय किए जाते हैं। हर इंसान अपनेआप में अलग है, उसे कम से कम अपना निजी जीवन खुद निर्धारण करने का अधिकार तो होना ही चाहिए।

जिस तरह धर्म एक गोरख़धंधा है, और भ्रष्टाचार करने वालों के लिए एक अच्छा माध्यम है, और उसी तरह से धर्मांतरण भी एक गोरख़धंधा है। आपकी वफादारी "एक तरह के भगवान" से "दूसरे तरह के भगवान" में बदलने की कोशिश की जाती है। काफी पैसा भी इसमें बनता है, बड़े बड़े दान मिलते हैं, और समाजसुधार का ढोंग भी होता है। खैर...

सबसे मजेदार बात ये है कि धर्म का ये गोरखधंधा अरबों लोगो को चला रहा है और धर्म करोड़ों लोगो की असमय मौत का कारण रहा है। दुनिया आज भी धर्म के नाम पर बँटी हुई है और आज भी कई लोगों की मौत का कारण धर्म ही है।

कभी कभी सोचता हूँ कि अगर दुनिया में धर्म ही नहीं होता तो कैसा होता...

अनुराग

3 टिप्पणियाँ:

Laxmi N. Gupta said...

अनुराग जी,

आपकी बात बिलकुल सही है। धर्म और भगवान का आविष्कार मनुष्य ने किया है। धर्म इन्सान के लिये होना चाहिए, न कि इन्सान धर्म के लिये। हो सकता है कि समय आ गया है कि धर्म से इन्सानों को विरत हो जाना चाहिए। अभी अभी रिचर्ड डाकिन्स(Richard Dawkins)की पुस्तक "The God Delusion" प्रकाशित हुई है जिसमें यही सिद्ध करने की कोशिश की गई है। धर्म और आधयात्मिकता में फर्क है, मैं यह मानता हूँ। धर्म भेड़चाल है, आधयात्मिकता स्वतन्त्रता है।

Pratik said...

बहुत अच्छा विश्लेषण किया है आपने। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि धर्म का अ‍र्थ मज़हब नहीं है और जहाँ तक मेरा ख़्याल है, आपके इस विश्लेषण का केन्द्र मज़हब है।

इसके अलावा मेरा मानना है कि यह सब त‍ब तक चलता रहेगा जब तक लोग सिर्फ़ 'विश्वास' करेंगे, जानने की बजाय मानेंगे। और मानने वालों में विभिन्न श्रेणियाँ होना स्वाभाविक है। जैसा कि आपने कहा, ये मानने वाले लोग अपनी-अपनी इच्छा से मज़हब और भगवान को गढ़ते रहेंगे। सवाल है जानने का, और ईमानदारी से जानने की कोशिश हममें से कितने लोग करते हैं? जिस दिन हम जान जाएंगे, उस दिन शायद ये सभी फ़साद थम जाएँ।

श्रीश । ई-पंडित said...

मैं Laxmi N. Gupta जी से सहमत हूँ, कमी धर्मों में नहीं उन्हैं चलाने वालों में है।