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Sunday, April 15, 2007

ग्लोबल वार्मिंग: कुछ सत्य कुछ मिथक

जैसा आपमें से कईयों ने देखा है कि परिचर्चा में मैंने एक विषय शुरू किया जिसमें कई लोगों ने ये बातें कहीं कि वे पर्यावरण बचाने में क्या योगदान करते हैं, और क्या करना चाहते हैं। ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दे पर कुछ मिथक और कुछ शंकाएं भी हैं तो मुझे लगा कि मैं इस मुद्दे पर कुछ अपने विचार रखूँ।

१ ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में डाटा कम है, और एक प्रकार का भ्रामक धंधा है ये।
आई पी सी सी कि ताज़ा रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण बात ये बात कही गयी है कि अब हमें मॉडल कि ज़रूरत नहीं है, बल्कि हमारे पास जमीनी आंकडें मौजूद हैं। इस बारे में ज्यादा बहस करने से पहले आप ये समाचार पढ़ सकते हैं।

२ इंसानी गतिवीधियों और कार्बन डाई ऑक्साइड कि बढती मात्रा का संबंध।
इस बारे में जो सबसे बड़ी बात कही जाती है, वो ये है कि ज्वालामुखियों और समुद्र से जो कार्बन डाई ऑक्साइड निकलती है वो इंसानी गतिविधियों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड से कई गुना ज्यादा होती है। ये बात सौ फी सदी सच है लेकिन प्राकृतिक माध्यमों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड, प्राकृतिक माध्यमों से दुबारा सोख ली जाती है। ऐसा इंसानी स्रोतों से निकलने वाली गैस के साथ नहीं है।

३ इंसानी गतिविधियों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड बहुत कम है।
यह बात भी सौ फी सदी सच है, लेकिन पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड कि मात्र बहुत ही कम है, और इसलिये इसमें होने वाली थोड़ी घट बढ़ भी इस नाज़ुक संतुलन को बिगाड़ सकती है।
इसी बात को अगर आगे बढ़ायें तो ये सर्वविदित तथ्य है कि फोसिल फुएल्स के जो अनगिनत स्रोत हैं धरती पर वे इसलिये बनें कि वातावरण में पहले कार्बन डाई ऑक्साइड कि मात्रा अधिक थी और अत्यधिक पेड़ पौधों के कारण ही ये संतुलन बदला। कई लाखों सालों में ये प्रक्रिया हुई, और जब ये पेड़ पौधे धरती में लाखों सालों तक अत्यधिक तापमान में रहे तो पेट्रोलियम के पदार्थ में बदले। अब सीधी सी बात ये है लाखों साल में बने यह पेट्रोलियम अगर हम २-३०० साल में फूंक दें तो पृथ्वी का वातावरण कैसा होगा?

४ कार्बन डाई ऑक्साइड और बढ़ते तापमान का कोई संबंध नहीं है
इस बात पर बहुत बहस हो चुकी है और चालू है, लेकिन ये सीधा सा गणित है कि पृथ्वी के पर्यावरण में बदलाव घातक सिद्ध होगा। वैसे आई पी सी सी कि फरवरी कि रिपोर्ट में ऐसा साफ साफ कहा गया है कि ये संबंध एकदम सीधा है।

५ ग्लोबल वार्मिंग के नाम पर किये गए व्यक्तिगत स्तर के प्रयास कोई खास महत्व नहीं रखते
पृथ्वी पर करीब ९ अरब लोग हैं। यदि हर व्यक्ति अपने द्वारा उत्सर्जित की गयी कार्बन डाई ऑक्साइड (और अन्य प्रदूषक) को प्रति वर्षा १० किलो कम कर दे तो पूरी पृथ्वी पर करीब ९ करोड़ टन गैस का उत्सर्जन हम कम कर सकते हैं. इसके अलावा बड़े स्तर पर जो प्रयास होने चाहिऐ वो अलग।

६ ये मुद्दा ज़रूरत से ज्यादा पीटा जा चुका है।
ऐसा लगता है कई बार खास कर उन्हें जो इस संबंध में प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यदि आप ध्यान से समाज और साथ के लोगों को देखें तो आपको समझ आएगा कि अभी भी करीब ९०-९५ प्रतिशत लोग रिसाइकल नहीं करते हैं, और संसाधनों का प्रयोग ठीक से नहीं करते हैं। यदि आपको इस बारे में कोई शक हो तो एक हफ्ते हर दिन अपने द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं की सूची बनायें, और उन चीजों को छाँटें जो आपने बिल्कुल बेकार प्रयोग की या आप रिसाइकल कर सकते थे, तो आपको इस बात का एहसास होगा।

७ और भी गम है ज़माने में
ये बात बिल्कुल सही है, और हर मुद्दे को महत्व दिया जाना चाहिऐ। लेकिन अधिकतर मुद्दे व्यक्तिगत स्तर पर हल करने पड़ते हैं, मगर उसको प्रेरणा कि ज़रूरत लगातार रहती है। अब एड्स का मुद्दा ही देखिए, यदि लोग अपने परिवार में और बच्चों को इस बारे में जानकारी नहीं देंगे तो ये मुद्दा हल नहीं हो सकता, गन्दी राजनीति कि बात देखिए तो ये तभी हल होगी जब तक ज्यादा ज्यादा से लोग राजनीति में रूचि नहीं लेते। ये सच है कि और भी गम है ज़माने में, और हमें चाहिऐ कि सब तरफ ध्यान दें, लेकिन एक बार में एक ही मुद्दे कि बात होती है। मसलन, इस चिट्ठे को आप ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में पढ़ रहे हैं और मैं अगर अफ्रीका कि भूखमरी कि बात चालू कर दूं तो मैं और आप भटक जायेंगे, और कोई भी मुद्दा नहीं हल होगा।

८ यदि ये ग्लोबल वार्मिंग और मानव गतिविधियों का संबंध सच नहीं हुआ तो?
इस बात कि सम्भावना लगभग नहीं के बराबर है। ग्लोबल वार्मिंग हो रही है इस बारे में कोई दो राय नहीं। फिर भी अगर ये बात साबित भी हो गयी कि (०.०००१%) मानवीय गतिविधिया इसके लिए जिम्मेदार नहीं है, तो भी इस बारे में किये आपके प्रत्येक प्रयास सार्थक होंगे। फोसिल फुएल खतम होंगे, ये सबको पता है, इसलिये हमें ना खतम होने वाले उर्जा के संसाधनों का प्रयोग करना ही पड़ेगा, और जितना जल्दी करें अच्छा है। वैसे भी छत पर पड़ते सूरज की रोशनी का प्रयोग ज्यादा समझदारी भरा है, बजाय ५००० मील दूर से मंगाई गयी उर्जा से। फोसिल फुएल से सिर्फ कार्बन डाई ऑक्साइड नहीं, कई हानिकारक पदार्थ भी निकलते हैं और इन पर निर्भरता कम करना, समझदारी ही होगी। जो पदार्थ प्राकृतिक रुप से नष्ट नहीं हो सकते, उनका प्रयोग ना करना मेरे ख़्याल से उचित हो होगा।

संसाधनों का न्यूनतम और समझदारी भरा प्रयोग विश्व की और समस्याओं को भी कम करेगा। इस बारे में फिर कभी...

राग

लोग घर में कितनी बर्बादी करते हैं

Friday, April 06, 2007

आई पी सी सी की ताज़ा रिपोर्ट - खतरनाक स्थिति

अब आई पी सी सी की ताज़ा रिपोर्ट भी गयी है। रिपोर्ट अगर आपने नहीं पढ़ी है तो रिपोर्ट की मुख्य बात ये है कि ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा असर गरीब देशों पर होगा। रिपोर्ट साफ साफ यह कहती है कि उत्तर भारत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली जगहों में से एक होगा. अब ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित होने वाले लोगों कि संख्या लाखों या करोड़ों में नहीं बल्कि अरबों में होगी. जो अब तक सो रहे हैं उन्हें ये एहसास होना चाहिऐ कि आज के बच्चे, क्या शायद हम और आप भी अच्छे वातावरण में सांस ना ले सकें।

हिंदी परिचर्चा में मैंने एक विषय शुरू किया है जिसमें आप पर्यावरण को दिए अपने सहयोग के बारे में चर्चा कर सकते हैं और दूसरों से प्रेरणा ले सकतें है। चर्चा करने वाले अधिकतर लोगों ने इस बात पर खास ज़ोर दिया कि वे यूज़ ऎंड थ्रो टाईप कि वस्तुओं का प्रयोग कम कर रहे हैं, और सी ऍफ़ एल बल्बों का प्रयोग कर रहे हैं। अतुल जी तो साइकिल का ही प्रयोग करते हैं और सोलर कुकर से खाना पकाते हैं। इसके अलावा भी चर्चा करने वालों ने कई प्रेरणादायक प्रयास गिनाये। आप भी पढ़िये, प्रेरणा लीजिये और बताइए कि आप क्या करते हैं पर्यावरण के लिए, और क्या करना चाहते हैं। बताइए कि पर्यावरण बचाने के लिए आपने आज क्या प्रतिज्ञा ली।

राग

Thursday, April 05, 2007

परिचर्चा में चर्चा कीजिये पर्यावरण को दिए अपने योगदान की

हिंदी परिचर्चा में मैंने एक विषय बनाया है जिसमें आप पर्यावरण को दिए अपने व्यक्तिगत सहयोग के बारे में अपना अनुभव बाँट सकतें हैं। इस चर्चा में आप उन सब बातों का उल्लेख करें जिससे आप को लगता है कि आप पर्यावरण को सहयोग दे रहे है। इससे ना सिर्फ ये पता चलेगा कि व्यक्तिगत स्तर पर हम पर्यावरण के लिए कितने जागरूक हैं, बल्कि पढने वाले लोगों को भी कुछ नया करने कि प्रेरणा मिलेगी। इस छोटे से प्रयास से शायद हम पृथ्वी का कुछ थोडा सा भला कर सकतें हैं।

तो फिर शुरू हो जाइए और सबको बताइए कि आप क्या कर रहे हैं पर्यावरण के लिए

अगर आपको लगता है आप कुछ करना चाहते हैं और किन्हीं कारणों से नहीं कर पा रहे हैं तो वो भी लिखिए

राग

Monday, April 02, 2007

सन् २०३० के बाद क्या गंगा बचेगी?

कल इस बारे में समाचार देखा कि २०३० तक हिमालय के हिमनद अपने आकार के १/५ ही रह जायेंगे। वैसे इस बारे में पहले भी को चेतावनियाँ आ चुकी हैं मगर यह ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि इन हिमनदों के घटने का स्तर बहुत तेजी से बढ़ रहा है और अगर पृथ्वी यूं ही गर्म होती रही तो २०३० तक यह हिमनद बुरी तरह घट जायेंगे। यदि आपको लगता है कि आपको कुछ करना चाहिऐ तो पढिये टाइम का ताज़ा अंक और कुछ प्रेरणा लीजिये। लोगों को और जागरूक बनाइये, कृपण होइये, बिजली बचाइए, मगर कैसे भी करके इस पृथ्वी को बचाइए।

समाचार कडियाँ
हिमनद का घट रह आकार
टाइम का ताज़ा अंक

राग

Wednesday, May 24, 2006

भस्मासुर बनते हम।

संदर्भ के लिए मैं सर्वप्रथम भस्मासुर की कहानी संक्षेप में बताता हूँ। भस्मासुर एक ऐसा राक्षस था जिसे वरदान था कि वो जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। भस्मासुर ने इस शक्ति का गलत प्रयोग शुरू किया और स्वयं शिव जी को भस्म करने चला। शिव जी ने विष्णु जी से सहायता माँगी। विष्णु जी ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण किया, भस्मासुर को आकर्षित किया और नृत्य के लिए प्रेरित किया। नृत्य करते समय भस्मासुर विष्णु जी की ही तरह नृत्य करने लगा, और उचित मौका देखकर विष्णु जी ने अपने सिर पर हाथ रखा, जिसकी नकल शक्ति और काम के नशे में चूर भस्मासुर ने भी की। भस्मासुर अपने ही वरदान से भस्म हो गया।

यह कहानी यदि हम ध्यान दें तो वास्तव में हमारी अपनी ही है। बहुत सारे मुद्दे हैं जिन्हे हम घ्यान दें तो पाएंगे की हम धीरे-धीरे किन्तु बड़े निश्चय से मानव जाति के विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। चाहे वह ग्लोबल वार्मिंग हो, पृथ्वी को हजारों बार नष्ट करने की ताकत वाले हथियार हों, बढ़ता अंतर्राष्ट्रीय तनाव हो, सामाजिक समस्याऐं हो, अथवा मानसिक असंतुष्टि हो। हम लोगों की तरफ से इन समस्याओं को बढ़ाने के प्रयास चालू हैं। इस चिट्ठे में फिलहाल मैं बी बी सी में छपी ग्लोबल वार्मिंग की खबर के बारे में बात करना चाहूँगा।

बी बी सी में छपी खबर के अनुसार अभी तक के ग्लोबल वार्मिंग के अनुमान लगभग 75% तक गलत हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हम अपने विनाश की तरफ अपने अनुमानों से बहुत तेज़ आगे बढ़ रहें हैं। इतने सब पर भी हम सब भस्मासुर की तरह अपनी ताकत और शक्ति के नशे में चूर वस्तुस्थिति को स्वीकार करने के लिए नहीं तैयार हैं।

क्योटो संधि, जिसके अनुसार सभी राष्ट्रों को समयबद्ध तरीके से जहरीली गैसों का उत्सर्जन कम करना होगा, अभी तक लटकी पड़ी है। क्येंकि विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र इस तथ्य को मानने को तैयार नहीं है। निजी तौर पर हम कुछ करना चाहते नहीं या जिम्मेदारी मानने से इनकार करते हैं। बिजली का ज़रूरत से ज्यादा प्रयोग, तेल का अनावश्यक जलाना, सभी संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी हमारी आदत बन चुके हैं। समस्या ये है कि हमें पहले ही काफी देर हो चुकी है, और हम अभी तक जैसे किसी ईश्वरीय भविष्यवाणी का इंतज़ार कर रहें हैं।

हम लोंगों को कम से कम निजी तौर पर अपनी पृथ्वी को बचाने के िलए सतत् प्रयास करने चाहिए। और दूसरों को इस बारे में प्रेरित भी करना चाहिए। शुरूआत के लिए कम्प्यूटर टेबल से उठने से पहले कम से कम माॅनीटर बन्द कर दीजिएगा।

अनुराग

मेरा पुराना चिट्ठा ऊर्जा अपव्यय के संदर्भ में