Monday, May 21, 2007

सैन फ्रांसिस्को की हमारी ताज़ा यात्रा

अमरीका में रहते हुये अब ५ साल से ऊपर हो गए मगर पश्चिम में जाने का मौका हमें अब मिला। यूँ तो यात्रा करीब ४ दिन की थी, मगर दौड़ भागी में ही समय निकल गया और पर्यटन कम हो पाया। लेकिन हर नयी जगह का अपना अनुभव अलग ही होता है। सबसे बड़ी गलती ये कि हम जाते वक्त अपना कैमरा भूल गए, अब इस पर कितनी डांट खायी, ये बात फिर कभी।

वैसे अगर न्यू यॉर्क और सैन फ्रांसिस्को में तुलना की जाये तो सैन फ्रांसिस्को कि यात्रा अपनेआप में काफी सरल थी। सबसे पहली जो चीज़ दिखी वो थी सैन फ्रांसिस्को का बहुत ही बड़ा एअरपोर्ट। हवाई जहाज से उतरने से लेकर कार रेंटल तक पहुचने में २० से २५ मिनट लगे, जिसमें थोड़ी सी ट्रेन यात्रा, काफी लिफ्ट्स, और कई एस्केलेटर्स से होकर गुज़रना पड़ा। अब हमारे जैसा लापरवाह आदमी चवन्नियां लेकर भी नहीं चला था की एक अदद कार्ट मिल जाती, सो एक बैग लाद कर और दो घसीट कर पूरा रास्ता चलाना पड़ा।

कार रेंटल में करीब आधा घंटा लंबी लाईन में इंतज़ार और करना पड़ा। खैर उन लोगों ने मुफ़्त का मानचित्र दे दिया सैन फ्रांसिस्को का, न्यू यॉर्क कि तरह नहीं सैन फ्रांसिस्को में लोग काफी तमीज से गाड़ी चलते हैं, इसलिये हमें ज्यादा दिक्कत नहीं हुई वहाँ, या फिर हम पुराने धुरंदर थे। खैर मुख्य शहर में हमारे होटल कि अपनी पार्किंग व्यवस्था नहीं थी, सो कुछ घंटों के लिए गाड़ी पार्क करने का ही १८ डॉलर देना पड़ा, रात भर वहीँ टिकाते गाड़ी तो होटल से ज्यादा खर्च पार्किंग का आ जाता उसके बाद से जाने कहाँ कहाँ खोज खोज कर गाड़ी मुफ़्त पार्किंग में लगायी।

सैन फ़्रांसिस्को एक खूबसूरत और बड़ा शहर है। जाहिर है कि कैमरा नहीं था इसलिये तसवीरें नहीं खींची मगर कैमरा फ़ोन से ये कुछ तसवीरें लीं है ट्रेज़र आइलैंड के पास। मौसम वहाँ का बड़ा अजीब लगा। हमेशा हवा चलती रहती है, और वो भी ठण्डी। मई के महिने में जैकेट पहन कर घूमना पड़ता था।



एक खास बात जो देखी सैन फ़्रांसिस्को में वो ये कि वहाँ के लोग पर्यावरण के प्रति बाक़ी जगहों से जागरूक लगे। कूड़ा रिसाईकल करने के लिए सब जगह सुविधाएं थीं। अधिकतर लोग सी ऍफ़ एल बल्ब का प्रयोग करते हैं। यहाँ तक कि विशालकाय सैन फ़्रांसिस्को पुल पर भी सी ऍफ़ एल बल्ब लगे थे।

सैन फ़्रांसिस्को से कई छोटे शहर भी जुड़े हुए हैं, जैसे कि फ्रेमोंट, जहाँ काफी भारतीय रहते हैं। फ्रेमोंट इतना खूबसूरत है, जैसे जन्नत, बिना किसी अतिशयोक्ति। फिर से तस्वीरों कि कमी खल रही है। वहाँ एक भारतीय-पाकिस्तानी भोजनालय में ख़ूब खाना खाया। गजब का सस्ता खाना, और बड़ा स्वादिष्ट। शाम को खाने के समय ऐसे भीड़ देखने को मिलती कि लगता कोई अपने घर में खाना बनाना ही नहीं चाहता। लोग फ़ोन से आर्डर करके फिर खाना लेके भी जाते थे। सफाई के बारे में ज्यादा कुछ खास नहीं कहा जा सकता, लेकिन जहाँ इतना खाना बनता हो वहाँ ठीक ही होगा ;)। मगर जाने क्यों भारतीय दुकानों के शौचालय कहीँ साफ क्यों नहीं मिलते? कहना मुश्किल है मगर क्या ये हमारा राष्ट्रीय चरित्र दिखाता है? एक दो भारतीय कपड़ों की दुकान भी दिखी, पर जाने क्यों महिलाओं के भारतीय कपड़े अमरीका में बड़े ही बेकार मिलते हैं (हमारी धर्म पत्नी के अनुसार)।

जैसा हमने पहले कहा है सैन फ़्रांसिस्को में मानचित्र आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन यहाँ अमेरिका के बाक़ी शहरों की तरह हर हाईवे एग्जिट की संख्या नहीं होती, जिससे कई बार धोखा हो सकता है कहीँ पहुंचने में, इसलिये गाड़ी चलते वक़्त ज्यादा ध्यान देना पड़ता है। खैर अब हमारा सैन फ़्रांसिस्को कई बार आना जाना होता रहेगा तो तस्वीरों की कमी भी जल्दी पूरी कर देंगे।

राग

5 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

बढ़िया रहा वृतांत. सेन फ्रांसिस्को और बिना कैमरा- यह तो घोर अन्याय है. :) अगली बार ऐसा न करना.

मिर्ची सेठ said...

क्या राग बाबू, बगल में आए और चुपके से हाथ लगा कर चले गए। खैर अगली बार आएं तो बताइगा, एक ब्लॉगर मीट यहाँ भी हो जाएगी।

आपके वर्णन से लगता है कि आप फ्रीमांट के शालीमार में खाना खा कर गए हैँ वैसे स्पाइस हट या मसाला ग्रिल भी हो सकता है।

यहाँ और भी बहुत सही दूकानें हैं व उनके नाम भी बहुत खूबसूरत हैं। कभी लिखेंगे इस बारे में

mamta said...

बहुत नाइंसाफी है। चलिये कोई बात नही अगली बार कैमरा जरुर लेकर जाइयेगा । वैसे ये फोटो भी अच्छे है।

संतोष said...

मगर जाने क्यों भारतीय दुकानों के शौचालय कहीँ साफ क्यों नहीं मिलते? कहना मुश्किल है मगर क्या ये हमारा राष्ट्रीय चरित्र दिखाता है?
एक गम्भीर समस्या है।

Raag said...

अच्छा लगा कि आप सबको वृत्तांत पठनीय लगा।

अरे पंकज भाई अपा ईमेल दीजिए, अगली बार जरूर संपर्क करेंगे। वैसे हमने तो शालीमार में खाया था।