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Sunday, June 10, 2007

पूरी बांह या आधी बांह?

दरजी की दुकान पर ये बात सुनने में अच्छी लग सकती है, मगर सोचिये अगर कोई आपका हाथ काटने से पहले ये सवाल करे तो?

कुछ दिन पहले ब्लड डायमंड देखी। सिएरा लिओन के गृह युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी ये फिल्म अगर आपने नहीं देखी तो आपको ज़रूर देखनी चाहिऐ। हीरे के पीछे की राजनीति, इस राजनीति का नतीजा गृह युद्ध, इस गृह युद्ध में फंसा पूरा देश, इस सब के बीच में पिसते लोग और उनके छोटे छोटे सपने, एक स्थानीय सेना द्वारा लोगों के हाथ काटना ताकि वो वोट ना दे पाएं। काफी उद्वेलित करती है ये फिल्म। हीरे के पीछे की हमारे मानसिकता को कितना छोटा साबित कर देती है।



एक और फिल्म देखी हाल में वो थी होटल रवांडा। तुत्सी और हुतु जातियों के बीच हो रहे गृह युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी ये फिल्म आपको इन्सान होने पर शर्मसार कर देगी। कितना भी कड़ा दिल कर लीजिये, फिल्म देख कर आंसू तो आने ही हैं। एक दृश्य है फिल्म का जिसमें फिल्म का मुख्य किरदार पॉल सबेरे सबेरे धुंध में गाड़ी से आ रह था। अचानक गाड़ी झटके खाने लगी तो पॉल नीचे उतर कर देखता है की सारी सड़क पर लाशें बिछी हैं जिनपर गाड़ी झटके खा रही थी। एक और दृश्य है जिसमें पॉल अपनी बीवी को छत पर बडे प्यार से डिनर के लिए बुलाता है और फिर उसे बड़े प्यार से समझाता है की अगर उपद्रवी होटल में आ गए तो उसे किस तरह से छत से कूद कर जान देनी होगी।

दस लाख से ऊपर लोगों की मौत और इससे ज्यादा लोगों का विस्थापन, ये था नतीजा इस गृह युद्ध का।





बार बार यही सोच रहा था की इन्सान आख़िर क्या चाहता है? है अगर सच देखने की हिम्मत तो ज़रूर देखियेगा इन दोनों फिल्मों को।

राग

मेरी कुछ पसंदीदा फिल्मों की सूची यह देखिए

Sunday, May 27, 2007

स्पाइडरमैन - ३ देख ली

वैसे देखे हुए तो करीब अब एक हफ्ता हो ही गया। बढ़िया फिल्म है। अब स्पाइडरमैन की फिल्म में एक्शन, स्टंट, और बेहतरीन प्रभाव तो होते ही हैं, लेकिन इसके अलावा भी कहानी में एक खास बात होती है जो आपको बाँध कर रखती है। स्पाइडरमैन श्रंखला कि मैंने तीनों फिल्में देखीं है और कई कई बार देखी हैं।

जहाँ तक कहानी का सवाल है स्पाइडरमैन-३ कि कहानी ये बताती है की सबसे बड़ा संघर्ष इन्सान के खुद के दिल में होता है। बदले कि भावना, असीम ताक़त, और गुरूर इन्सान को भ्रष्ट बना सकता है, चाहे वो स्पाइडरमैन ही क्यों ना हो। और मदद की ज़रूरत भी सबको होती है, फिर चाहे हो स्पाइडरमैन ही क्यों ना हो। दूसरों के नज़रिये को समझना चाहिऐ और इसे समझने के लिए समय भी देना चाहिऐ।



मूवी के अपने कुछ खास पल हैं। पीटर पार्कर और मैरी जेन का मकड़ी के जाल पर बैठ कर बातें और प्यार करने का दृश्य बड़ा ही खूबसूरत बना है। एक बहुत ही महत्वपूर्ण दृश्य तब है जब पीटर पार्कर अपनी आंटी से कहता है की वो मैरी से शादी करने के लिए कहेगा। इस समय बाक़ी बातों के अलावा पीटर कि आंटी उसे बताती है की शादी से पहले इस बात का वादा करो कि खुद से आगे हमेशा अपनी पत्नी को रखोगे। और ये भी की लड़कियों से शादी के लिए पूछना उनके लिए एक बहुत खास पल होता है, और इसको जितना खूबसूरत बना सको, बनाना। अब मैं पीटर कि आंटी के सारे उदगार बता दूंगा तो आपका मूवी का मज़ा खराब हो जाएगा।

स्पाइडरमैन-३ ज़रूर देखिए क्यूंकि इसमें स्पाइडरमैन है, खूबसूरत मैरी जेन है, बेहतरीन स्टंट, और एक्शन है, लेकिन इससे भी बड़ी बात है आपको बाँध के रखने वाली कहानी।

राग

Wednesday, December 20, 2006

धूम-२ः कूड़े का ढेर

रात के २ बज रहे हैं, घर पर अभी धूम-२ खत्म हुई है। मित्रों के साथ मिल कर ६ लोगों ने देखनी शुरू की, एक बीच में घर चला गया, और एक सो गया। बाकी जिन्होने खत्म की, उनके चेहरे के भाव एसे हैं जैसे किसी ने बूरी तरह बेवकूफ बनाया हो।

सबसे पहले, कहानी बेकार, फिर पटकथा, अदाकारी तो खैर थी ही नहीं। हाल ये है कि ज्यादा बुराई करने की भी इच्छा नहीं हो रही। सच बताऊँ तो दिल सा टूट गया, इतनी हाइप्ड मूवी की ये हालत देख कर। अगर बिपाशा को टू पीस में और एश्वर्य को कुछ भड़काऊ कपड़ों में देखना हो तो आप ये मूवी देखने की हिम्मत करें, लेकिन फिर भी ये सौदा महँगा ही होगा।

खैर २००६ की मेरी बेहतरीन हिन्दी मूवीज़ की सूची। मेरे ख्याल से २००६ फिर भी अच्छा रहा निम्नलिखित अच्छी मूवीज़ पर गौर करें तो।

१. खोसला का घोंसला
२. रंग दे बसंती
३. लगे रहो मुन्नाभाई
कॉर्पोरेट
डोर
ओंकारा
बीइंग साइरस
५. प्यार के साईड इफैक्ट्स
आहिस्ता आहिस्ता

अनुराग

Thursday, August 10, 2006

करण जौहर का एक और तमाशा...

करण जौहर साहब फिर एक और एसे सिनेमा (कभी अलविदा ना कहना) के साथ आ रहे हैं जो पौने चार घंटे लंबा है (बाप रे बाप), उसमे लंबे-लंबे रोने धोने के सीन होंगे, जीवन से बड़े फ्रेम होंगे और काफी उपदेश होंगे। मेरी तो इच्छा पौने चार घंटे सुन के ही खत्म हो गई।

सिनेमा के बाद शाहरुख खान की बासी एक्टिंग की बड़ी तारीफ होगी, सारा का सारा मीडिया भी इसी में जुट जाएगा। आखिर करन जौहर सभी जगह पैसा लगाते जो हैं ;)। जी सिने अवार्ड में सारे के सारे अवार्ड इसी को मिलेंगे। शाहरुख खान सर्वोत्तम अभिनेता, बाकी सब को भी कुछ ना कुछ मिलेगा ही।

थोड़ा बहुत फिल्मफेयर में भी मिलेगा ही।

सोच रह हूँ कि मुझे इतना कैसे पता है...

संपादित- ये लीजिए मेरी बात सच करती एक दर्शक की टिप्पणी।
आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. तरन आदर्श जैसे समीक्षक पहले से ही गुणगान शुरू कर चुके हैं. बॉलीवुड में समीक्षकों के भी गुट हैं. (उदाहरण के लिए- सुभाष के. झा भूल के भी आमिर की तारीफ़ में कोई वाक्य नहीं लिख सकता.)फ़िल्म देखी. साढ़े तीन घंटे वाला प्रिंट था. लगा आराम से ढाई घंटे में काम चलाया जा सकता था. दो गाने तो सीधे-सीधे ठूंसे हुए लग रहे थे.एक्टिंग के नाम पर सिर्फ़ रानी की एक्टिंग से काम चलाइए. शाहरुख और प्रीटि ही नहीं, बल्कि अमिताभ की भी ओवरएक्टिंग है. अमिताभ एक छिछोरे पात्र की भूमिका में एक्टिंग करते हुए पहली बार अपने बेटे से पीछे छूट गए हैं. वो भी तब, जब सबको पता है अभिषेक ख़ुद कितने बड़े अभिनेता हैं! फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान भूल जाते हैं कि उन्हें कितना लंगड़ाना है- मतलब, कभी झटके-मार लंगड़ा बन जाते हैं, कभी हल्का लंगड़ापन ले के चलते हैं, तो कभी-कभी कोई लंगड़ापन नहीं. (होठों को थरथरा के भर्राई आवाज़ में बोलने मात्र को एक्टिंग मानते हों, तब तो शाहरूख़ ने ज़बरदस्त एक्टिंग की है.)कहानी बिल्कुल ही बेतुकी तो है ही, पटकथा में अनेक झोल है. शाहरुख़ ख़ान फ़िल्म के शुरू में फ़ुटबॉलर हैं और निर्देशक की बलिहारी एक उदाहरण देखें- शाहरुख़ को पेनाल्टी किक लेना है तो वह 10-12 मीटर दूर से(क्रिकेट के तेज़ गेंदबाज़ जैसी तेज़ी से) भाग कर आते हैं गेंद को ठोकर मानने के लिए! अभी-अभी विश्व कप फ़ुटबॉल के दर्जनों मैच देखे थे- किसी देश के किसी खिलाड़ी ने किक लेने के लिए इतनी लंबी दौड़ नहीं लगाई!अच्छी चीज़ों में से हैं- दो गाने, ख़ास कर वो गाना जिसमें ढोलक का बेहतरीन प्रयोग है. और न्यूयॉर्क की ज़बरदस्त सिनेमोटोग्राफ़ी!